संहार
के देवता भगवान शिव का एक ऐसा मंदिर देश में मौजूद है, जहां ये भगवान शंकर
भक्तों के मृत्यु का संकट तक टाल देते हैं। दरअसल हम बात कर रहे हैं
देवीभूमि के कुमाऊं क्षेत्र की जिसकी गोद में बसा है भगवान शिव का प्राचीन
जागेश्वरधाम। जो कि केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि मंदिरों की नगरी है। ये
मंदिर सैकड़ों साल पहले बने थे।
इस धाम के बारे में कहा जाता है कि
यहां महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से जीवन तो सुधरता ही है, मृत्यु भी
टल जाती है। जागेश्वर मंदिर समूह प्राचीनता के साथ ही अपनी वास्तुकला के
लिए प्रसिद्ध है। ये धाम 125 छोटे-बड़े मंदिरों का समूह है।
कहा जाता
है कि जागेश्वर मंदिर कैलाश मानसरोवर यात्रा के प्राचीन मार्ग पर पड़ता है।
इसे भक्त शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक प्रमुख ज्योर्तिलिंग मानते
है। वहीं इसे उत्तराखंड के पांचवें धाम के रूप में भी जाना जाता है। यहां
हर साल सावन महीने में यहां श्रावणी मेला लगता है जो कि 1 महीने तक चलता
है। इसमें हिस्सा लेने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु हर साल यहां
पहुंचते हैं।
जागेश्वर धाम अल्मोड़ा से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर
स्थित है। यहां बने मंदिरों का निर्माण आठवीं से 10वीं शताब्दी के बीच
कराया गया। मंदिरों के निर्माण का श्रेय कत्यूरी और चंद्र शासकों को जाता
है, जो कि सैकड़ों साल पहले इस क्षेत्र पर राज किया करते थे।
कहा तो
ये भी जाता है जागेश्वर धाम में भगवान शिव ने तप किया था। इसके अलावा
जागेश्वर मंदिर की पहाड़ी पर लगभग साढ़े 4 किलोमीटर दूर जंगल में एक ऐसा
स्थान है, जहां शिव के पद चिह्न को साक्षात देखा जा सकता है।
मान्यता
है कि जब पांडव स्वर्ग जा रहे थे तब उनकी इच्छा शिवजी के दर्शन और उनके
सान्निध्य में रहने की हुई, लेकिन शिवजी कैलाश पर्वत जाकर ध्यान करना
चाहते थे। पांडव इसके लिए राजी नहीं हुए। तब शिवजी ने भीम से विश्राम करने
के लिए कहा और वे चकमा देकर कैलाश चले गए। जहां से उन्होंने कैलाश के लिए
प्रस्थान किया था, वहां उनके एक पैर का चिह्न बना हुआ है।
संहार
के देवता भगवान शिव का एक ऐसा मंदिर देश में मौजूद है, जहां ये भगवान शंकर
भक्तों के मृत्यु का संकट तक टाल देते हैं। दरअसल हम बात कर रहे हैं
देवीभूमि के कुमाऊं क्षेत्र की जिसकी गोद में बसा है भगवान शिव का प्राचीन
जागेश्वरधाम। जो कि केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि मंदिरों की नगरी है। ये
मंदिर सैकड़ों साल पहले बने थे।
इस धाम के बारे में कहा जाता है कि
यहां महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से जीवन तो सुधरता ही है, मृत्यु भी
टल जाती है। जागेश्वर मंदिर समूह प्राचीनता के साथ ही अपनी वास्तुकला के
लिए प्रसिद्ध है। ये धाम 125 छोटे-बड़े मंदिरों का समूह है।
कहा जाता
है कि जागेश्वर मंदिर कैलाश मानसरोवर यात्रा के प्राचीन मार्ग पर पड़ता है।
इसे भक्त शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक प्रमुख ज्योर्तिलिंग मानते
है। वहीं इसे उत्तराखंड के पांचवें धाम के रूप में भी जाना जाता है। यहां
हर साल सावन महीने में यहां श्रावणी मेला लगता है जो कि 1 महीने तक चलता
है। इसमें हिस्सा लेने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु हर साल यहां
पहुंचते हैं।
जागेश्वर धाम अल्मोड़ा से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर
स्थित है। यहां बने मंदिरों का निर्माण आठवीं से 10वीं शताब्दी के बीच
कराया गया। मंदिरों के निर्माण का श्रेय कत्यूरी और चंद्र शासकों को जाता
है, जो कि सैकड़ों साल पहले इस क्षेत्र पर राज किया करते थे।
कहा तो
ये भी जाता है जागेश्वर धाम में भगवान शिव ने तप किया था। इसके अलावा
जागेश्वर मंदिर की पहाड़ी पर लगभग साढ़े 4 किलोमीटर दूर जंगल में एक ऐसा
स्थान है, जहां शिव के पद चिह्न को साक्षात देखा जा सकता है।
मान्यता
है कि जब पांडव स्वर्ग जा रहे थे तब उनकी इच्छा शिवजी के दर्शन और उनके
सान्निध्य में रहने की हुई, लेकिन शिवजी कैलाश पर्वत जाकर ध्यान करना
चाहते थे। पांडव इसके लिए राजी नहीं हुए। तब शिवजी ने भीम से विश्राम करने
के लिए कहा और वे चकमा देकर कैलाश चले गए। जहां से उन्होंने कैलाश के लिए
प्रस्थान किया था, वहां उनके एक पैर का चिह्न बना हुआ है।



Journalist खबरीलाल














