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बसंत पंचमी पर विशेष (विजय मिश्रा) :: बसंत पंचमी - वाद्य-कलम-किताबों की पूजा का पर्व:

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संपूर्ण सृष्टि में ऋतु परिवर्तन प्रकृति का नियम है।इस नियम केअंतर्गत भारतवर्ष में दो दो मास के क्रम में छ:ऋतुएंआती है।जिसमें बसंत ऋतु को सर्वश्रेष्ठ ऋतु कहा गया है।यह ऋतु हरेक जीवधारी के लिए चाहे वह पेड़-पौधे,पशु-पक्षी,अथवा मानव समुदाय का हो सभी के लिए हर दृष्टि से हितकारी है।गीता में इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि-- "ऋतुओं में श्रेष्ठ मैं बसंत हूं"।    बसंत ऋतु के माघ महीने के शुक्ल पक्ष के पांचवे दिन को बसंत पंचमी पर्व के रूप में मनाया जाता है।यह एक ऐसा पर्व है जो कि चहूं ओर नव उमंग -उत्साह- उल्लास की ध्वनि को गूंज्जित करता है।इस पर्व को नवजागृति पर्व भी कहा जाता है।

बंसत पंचमी पर्व मनाने की पौराणिक कथा :: पौराणिक कथाओं के अनुसार सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने की है।उन्होंने सृष्टि की संरचना करते समय विविध जीव-जंतु,कीट-पतंगे, पशु- पक्षी के साथ-साथ पेड़-पौधों की भी रचना की।इन सभी रचनाओं के बाद भी उन्हें सृष्टि में जीवंत सौंदर्य बोध के कलरव की कमी खटक रही थी। सृष्टि में छाए मौन,स्तब्धता सन्नाटा को तोड़ने के लिए उन्होंने अपने कमंडल सेअपनीअंजूरी में जल लेकर वायुमंडल में उसे छिड़क दिया।जिससे चार भुजाओं वाली मनोहारी देवी प्रकट हुईं।जिनके हाथों में वीणा,पुस्तक,मालाऔर वर मुद्राएं सुशोभित हो रही थी।

नवअवतरीत देवी जी से ब्रम्हा जी ने वीणावादन का आग्रह किया।जिसे स्वीकार करते हुए देवी जी ने जब वीणा का मधुर नाद किया तो सृष्टि में कम्पन,कोलाहल, जलधाराओं में कलकल, हवाओं में सरसराहट की गूंज सुनाई दी।सभी सजीव-निर्जीव चीजों में स्वर-नाद-वाणी की उत्पत्ति हो गई।जिसे देखकर सुनकर ब्रम्हा जी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती नाम दिया।सरस्वती देवी का अवतरण बसंत ऋतु के माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही हुआ, अतः इस दिवस को विद्या देवी की जयंती के रूप में मनाने की प्रथाआरंभ हुई।इस तिथी को बसंत पंचमी,ऋषि पंचमी, मदनोत्सव,वागीश्वरी जयंती के नाम से ख्याति मिली। 


सरस्वती वाहन हंस की खूबियां :: बंसत पंचमी को अवतरित, श्वेत वस्त्रधारी विद्यादेवी हंस पक्षी पर विराजमान होती हैं।उनका वाहन भीअतिविशिष्ट गुणों से भरपूर है।यहअकेला ऐसा जीव है जो नभ में उड़ सकता है।जल में तैर सकता हैऔर थल में विचरण कर सकता है।ऐसी भी मान्यता है कि दूध का दूध ,पानी का पानी करने अर्थात नीर-क्षीर निर्णय की क्षमता हंस में होती है।

बंसत पंचमी अर्थात अबूझ मुहूर्त :: अतीव पवित्र दिवस बसंत पंचमी को कोई भी कार्यआरंभ करने के लिए सर्वश्रेष्ठ दिवस माना गया है। ज्योतिष विद्यानुसार इस दिवस मूत्वा मुहुर्त होता हैअर्थात इस दिवस में कोई भी शुभ कार्य आरंभ कर सकते हैं।ऐसी मान्यता के कारण ही इस दिवस पर विवाह, गृह-प्रवेश,वाहन क्रय,कन्याओं का नाक कान छेदन, शिशुओं का शिक्षारंभ, बच्चों काअन्न प्राशन जैसे मानव जीवन के अतिमहत्वपूर्ण मांगलिक कार्यों का निष्पादन सहर्ष किया जाता है।निर्धन छात्र छात्राओं को कॉपी किताब कलम दान देने की भी प्रथा इस दिवस में है।


वाद्यों-किताबों-कलम की पूजा :: बंसत पंचमी के दिन कलाकार अपने वाद्ययंत्रों, साहित्यकार अपनी कलम और किताबों की पूजा अर्चना ठीक उसी तरह करते हैं।जिस तरह दीपोत्सव में ब्यवसायीअपने बही खाता तिजोरी की पूजा करते हैं।यह सर्वविदित है की कलाकारों के द्वारा प्रयुक्त समस्त वाद्य निर्जीव होते हैं। वे बेजान वस्तुओं जैसे कि सूखी लकड़ी,लौहतार, मिट्टी,मृतजीवों की चमड़ी आदि से ही निर्मित होते हैं।इन सबको जब कलाकार बजाते हैं तो उन वाद्यों से उत्पन्न ध्वनि (लय ताल) जीवित जनमन को मोहित कर लेते हैं।संगीत की देवी सरस्वती की ओर से बेजान वाद्यों सहित प्रबुद्ध कलाकारों को मिलाअद्भुत वरदान यही है।

पीले वस्त्र- खाद्यान्नों की पूछ परख ::  सावन मास का नाम लेते ही जैसे हरियाली की छटा मन में छा जाती है।उसी तरह बसंत में संपूर्ण प्रकृति बसंती रंगों से सराबोर दृष्टब्य होती है।बसंत पंचमी के दिन पीले वस्त्र धारण कर विद्या की देवी की पूजाअर्चना उपरांत पीले खाद्य पदार्थों का सेवन श्रेयस्कर माना गया है।ऐसी मान्यता है कि पीले वस्त्र तन मन को सरस बनाकर आनंद उल्लास का संचार करते हैं।इस मौसम में पीले फूलों से लबरेज सरसों,सनई, सूरजमुखी,गेंदा तथाअरहर दलहन के पौधे खेतों में लहलहाते है।गेहूं,चना,और जौ के पके दानों की महक प्रकृति में गमक उठती है। तितली,भंवरे,मधुमक्खियां गुनगुनाते हुए फूलों के मकरंद का रसपान करने कोआतुर होती है।नए वस्त्रों को धारण करने की चाहत लिए पेड़-पौधे भीअपने पुराने पीले हो चले पत्तों को त्याग देते हैं,जिसके बाद पौधों में पल्लवित विविध रंगों की कोंपलों से पौधों का मनमोहक श्रृंगार होता है। जिसे देखकर कोयल कुकती है।मोर नाच उठता है।आम, पलाश,जैसे पेड़ भी जनाकर्षण का केंद्र बन जाते हैं।


रंगपर्व होली की घोषणा :: यह दिवस रंगो का महापर्व होली के आगमन का सूचक भी होता है।इस दिन होलिका दहन स्थल की सफाई कर अरंडी के पेड़ की डगाल को वहां गाड़ दिया जाता है।होली हेतु एकत्रित लकड़ी,कंडे को वहां सजाने का कार्य आरंभ किया जाता है।नंगाड़े की धून के साथ फाग गाने की होड़ मचने लगती है।

महान विभूतियों के महान कार्य :: बसंत पंचमी का दिवस न केवल पौराणिक धार्मिक दृष्टि से अपितु इतिहासऔर साहित्य जगत की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण दिवस है। इस दिन ही भीलनी शबरी के घर पधारे भगवान श्रीराम ने उसके ममता भरे जूठे बेर खाए थे।इसी दिन राजाभोज की जयंती मनाई जाती है।इतिहास में ऐसी भी मान्यता है कि शूरवीर महाराज पृथ्वीराज चौहान ने मुस्लिम बादशाह मोहम्मद गौरी को शब्दभेदी बाण चलाकर बसंत पंचमी के दिन ही मार दिया था। हिंदी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म बसंत पंचमी के दिन हुआ। कालजयी सरस्वती वंदना "वर दे वीणावादिनि वर दे"  के रचयिता निराला जी निर्धनों के लिएअपने धन धान्य,वस्त्र आदि खुले दिल से दान कर देते थे।इसलिए उन्हें महामानव "महाप्राण"भी कहते हैं।महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी ने बंसत पंचमी के दिन ही बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का शुभारंभ किया था।


सर्वोत्तम धन है विद्या :: हमारे ऋषियोंऔर वैदिक ग्रंथों के अनुसार विद्या के बिना इंसान का जीवन व्यर्थ होता है।अनादि काल से यह बात कही जा रही हैअतः विद्या की देवी सरस्वती की जयंती पर अनपढ़ को अक्षर दान करने का संकल्प लें। साथ ही स्मरण करें इन पंक्तियों को- कुछ लिखकर सो,कुछ पढ़ कर सो,जागा जिस जगह,उससे आगे बढ़कर सो।




संपूर्ण सृष्टि में ऋतु परिवर्तन प्रकृति का नियम है।इस नियम केअंतर्गत भारतवर्ष में दो दो मास के क्रम में छ:ऋतुएंआती है।जिसमें बसंत ऋतु को सर्वश्रेष्ठ ऋतु कहा गया है।यह ऋतु हरेक जीवधारी के लिए चाहे वह पेड़-पौधे,पशु-पक्षी,अथवा मानव समुदाय का हो सभी के लिए हर दृष्टि से हितकारी है।गीता में इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि-- "ऋतुओं में श्रेष्ठ मैं बसंत हूं"।    बसंत ऋतु के माघ महीने के शुक्ल पक्ष के पांचवे दिन को बसंत पंचमी पर्व के रूप में मनाया जाता है।यह एक ऐसा पर्व है जो कि चहूं ओर नव उमंग -उत्साह- उल्लास की ध्वनि को गूंज्जित करता है।इस पर्व को नवजागृति पर्व भी कहा जाता है।

बंसत पंचमी पर्व मनाने की पौराणिक कथा :: पौराणिक कथाओं के अनुसार सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने की है।उन्होंने सृष्टि की संरचना करते समय विविध जीव-जंतु,कीट-पतंगे, पशु- पक्षी के साथ-साथ पेड़-पौधों की भी रचना की।इन सभी रचनाओं के बाद भी उन्हें सृष्टि में जीवंत सौंदर्य बोध के कलरव की कमी खटक रही थी। सृष्टि में छाए मौन,स्तब्धता सन्नाटा को तोड़ने के लिए उन्होंने अपने कमंडल सेअपनीअंजूरी में जल लेकर वायुमंडल में उसे छिड़क दिया।जिससे चार भुजाओं वाली मनोहारी देवी प्रकट हुईं।जिनके हाथों में वीणा,पुस्तक,मालाऔर वर मुद्राएं सुशोभित हो रही थी।

नवअवतरीत देवी जी से ब्रम्हा जी ने वीणावादन का आग्रह किया।जिसे स्वीकार करते हुए देवी जी ने जब वीणा का मधुर नाद किया तो सृष्टि में कम्पन,कोलाहल, जलधाराओं में कलकल, हवाओं में सरसराहट की गूंज सुनाई दी।सभी सजीव-निर्जीव चीजों में स्वर-नाद-वाणी की उत्पत्ति हो गई।जिसे देखकर सुनकर ब्रम्हा जी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती नाम दिया।सरस्वती देवी का अवतरण बसंत ऋतु के माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही हुआ, अतः इस दिवस को विद्या देवी की जयंती के रूप में मनाने की प्रथाआरंभ हुई।इस तिथी को बसंत पंचमी,ऋषि पंचमी, मदनोत्सव,वागीश्वरी जयंती के नाम से ख्याति मिली। 


सरस्वती वाहन हंस की खूबियां :: बंसत पंचमी को अवतरित, श्वेत वस्त्रधारी विद्यादेवी हंस पक्षी पर विराजमान होती हैं।उनका वाहन भीअतिविशिष्ट गुणों से भरपूर है।यहअकेला ऐसा जीव है जो नभ में उड़ सकता है।जल में तैर सकता हैऔर थल में विचरण कर सकता है।ऐसी भी मान्यता है कि दूध का दूध ,पानी का पानी करने अर्थात नीर-क्षीर निर्णय की क्षमता हंस में होती है।

बंसत पंचमी अर्थात अबूझ मुहूर्त :: अतीव पवित्र दिवस बसंत पंचमी को कोई भी कार्यआरंभ करने के लिए सर्वश्रेष्ठ दिवस माना गया है। ज्योतिष विद्यानुसार इस दिवस मूत्वा मुहुर्त होता हैअर्थात इस दिवस में कोई भी शुभ कार्य आरंभ कर सकते हैं।ऐसी मान्यता के कारण ही इस दिवस पर विवाह, गृह-प्रवेश,वाहन क्रय,कन्याओं का नाक कान छेदन, शिशुओं का शिक्षारंभ, बच्चों काअन्न प्राशन जैसे मानव जीवन के अतिमहत्वपूर्ण मांगलिक कार्यों का निष्पादन सहर्ष किया जाता है।निर्धन छात्र छात्राओं को कॉपी किताब कलम दान देने की भी प्रथा इस दिवस में है।


वाद्यों-किताबों-कलम की पूजा :: बंसत पंचमी के दिन कलाकार अपने वाद्ययंत्रों, साहित्यकार अपनी कलम और किताबों की पूजा अर्चना ठीक उसी तरह करते हैं।जिस तरह दीपोत्सव में ब्यवसायीअपने बही खाता तिजोरी की पूजा करते हैं।यह सर्वविदित है की कलाकारों के द्वारा प्रयुक्त समस्त वाद्य निर्जीव होते हैं। वे बेजान वस्तुओं जैसे कि सूखी लकड़ी,लौहतार, मिट्टी,मृतजीवों की चमड़ी आदि से ही निर्मित होते हैं।इन सबको जब कलाकार बजाते हैं तो उन वाद्यों से उत्पन्न ध्वनि (लय ताल) जीवित जनमन को मोहित कर लेते हैं।संगीत की देवी सरस्वती की ओर से बेजान वाद्यों सहित प्रबुद्ध कलाकारों को मिलाअद्भुत वरदान यही है।

पीले वस्त्र- खाद्यान्नों की पूछ परख ::  सावन मास का नाम लेते ही जैसे हरियाली की छटा मन में छा जाती है।उसी तरह बसंत में संपूर्ण प्रकृति बसंती रंगों से सराबोर दृष्टब्य होती है।बसंत पंचमी के दिन पीले वस्त्र धारण कर विद्या की देवी की पूजाअर्चना उपरांत पीले खाद्य पदार्थों का सेवन श्रेयस्कर माना गया है।ऐसी मान्यता है कि पीले वस्त्र तन मन को सरस बनाकर आनंद उल्लास का संचार करते हैं।इस मौसम में पीले फूलों से लबरेज सरसों,सनई, सूरजमुखी,गेंदा तथाअरहर दलहन के पौधे खेतों में लहलहाते है।गेहूं,चना,और जौ के पके दानों की महक प्रकृति में गमक उठती है। तितली,भंवरे,मधुमक्खियां गुनगुनाते हुए फूलों के मकरंद का रसपान करने कोआतुर होती है।नए वस्त्रों को धारण करने की चाहत लिए पेड़-पौधे भीअपने पुराने पीले हो चले पत्तों को त्याग देते हैं,जिसके बाद पौधों में पल्लवित विविध रंगों की कोंपलों से पौधों का मनमोहक श्रृंगार होता है। जिसे देखकर कोयल कुकती है।मोर नाच उठता है।आम, पलाश,जैसे पेड़ भी जनाकर्षण का केंद्र बन जाते हैं।


रंगपर्व होली की घोषणा :: यह दिवस रंगो का महापर्व होली के आगमन का सूचक भी होता है।इस दिन होलिका दहन स्थल की सफाई कर अरंडी के पेड़ की डगाल को वहां गाड़ दिया जाता है।होली हेतु एकत्रित लकड़ी,कंडे को वहां सजाने का कार्य आरंभ किया जाता है।नंगाड़े की धून के साथ फाग गाने की होड़ मचने लगती है।

महान विभूतियों के महान कार्य :: बसंत पंचमी का दिवस न केवल पौराणिक धार्मिक दृष्टि से अपितु इतिहासऔर साहित्य जगत की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण दिवस है। इस दिन ही भीलनी शबरी के घर पधारे भगवान श्रीराम ने उसके ममता भरे जूठे बेर खाए थे।इसी दिन राजाभोज की जयंती मनाई जाती है।इतिहास में ऐसी भी मान्यता है कि शूरवीर महाराज पृथ्वीराज चौहान ने मुस्लिम बादशाह मोहम्मद गौरी को शब्दभेदी बाण चलाकर बसंत पंचमी के दिन ही मार दिया था। हिंदी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म बसंत पंचमी के दिन हुआ। कालजयी सरस्वती वंदना "वर दे वीणावादिनि वर दे"  के रचयिता निराला जी निर्धनों के लिएअपने धन धान्य,वस्त्र आदि खुले दिल से दान कर देते थे।इसलिए उन्हें महामानव "महाप्राण"भी कहते हैं।महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी ने बंसत पंचमी के दिन ही बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का शुभारंभ किया था।


सर्वोत्तम धन है विद्या :: हमारे ऋषियोंऔर वैदिक ग्रंथों के अनुसार विद्या के बिना इंसान का जीवन व्यर्थ होता है।अनादि काल से यह बात कही जा रही हैअतः विद्या की देवी सरस्वती की जयंती पर अनपढ़ को अक्षर दान करने का संकल्प लें। साथ ही स्मरण करें इन पंक्तियों को- कुछ लिखकर सो,कुछ पढ़ कर सो,जागा जिस जगह,उससे आगे बढ़कर सो।



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