संवाददाता/सौरभ साहू ,भटगांव जिला सूरजपुर छत्तीसगढ़।
सूरजपुर/भटगांव। प्रदेश में काले हीरे की नगरी के नाम से पहचान रखने वाला भटगांव क्षेत्र एक ओर देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, वहीं दूसरी ओर यहां के लोग मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। एसईसीएल भटगांव क्षेत्र की खदानों से हर महीने करोड़ों-अरबों रुपये मूल्य का कोयला उत्पादन किया जाता है, लेकिन खनन प्रभावित क्षेत्रों के नागरिक आज भी स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित हैं। नगर पंचायत भटगांव के वार्ड क्रमांक 8 और 10 में पेयजल संकट गंभीर रूप लेता जा रहा है। स्थानीय रहवासियों का आरोप है कि सुबह जलापूर्ति शुरू होने के बाद कई घंटों तक नलों से कोयला मिश्रित काला पानी निकलता है। लोगों का कहना है कि यह पानी न पीने योग्य होता है और न ही घरेलू उपयोग के लिए उपयुक्त। इसके कारण दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा है तथा लोगों में स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी बढ़ रही हैं।स्थानीय नागरिकों के अनुसार यह समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि लंबे समय से बनी हुई है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि जिस इलाके में वर्षों से कोयला खनन किया जा रहा है, वहां जल स्रोतों और पेयजल व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए था, लेकिन स्थिति इसके विपरीत दिखाई दे रही है।जानकारी के अनुसार क्षेत्र में जल शोधन (फिल्टर) की व्यवस्था मौजूद है, फिर भी वार्ड 8 और 10 के लोगों को स्वच्छ पानी नहीं मिल पा रहा है। स्थानीय लोगों का दावा है कि खदान क्षेत्र से आने वाला पानी पहले प्रभावित वार्डों तक पहुंचता है और उसके बाद शोधन प्रक्रिया से गुजरता है। इसके चलते जल गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
भटगांव क्षेत्र के लोगों का कहना है कि एसईसीएल की खदानों से वर्षों से बड़े पैमाने पर कोयला उत्पादन हो रहा है। कई ग्रामीण अपनी जमीनें खनन परियोजनाओं के लिए दे चुके हैं, लेकिन आज भी अनेक प्रभावित परिवार रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में पेयजल संकट ने लोगों की परेशानियों को और बढ़ा दिया है।
क्षेत्रवासियों ने जलापूर्ति व्यवस्था की निगरानी और रखरखाव पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि नियमित निरीक्षण, सफाई और गुणवत्ता परीक्षण के अभाव में समस्याएं लगातार बनी हुई हैं। लोगों का आरोप है कि जिम्मेदार एजेंसियों द्वारा प्रभावी निगरानी नहीं किए जाने के कारण स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पा रहा है।स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब भटगांव की खदानें देश को ऊर्जा देने और अरबों रुपये का राजस्व उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं, तब खनन प्रभावित क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा सुनिश्चित करना भी एसईसीएल और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है। इसके बावजूद वार्ड 8 और 10 के लोग आज भी काला पानी मिलने की समस्या से जूझ रहे हैं।
क्षेत्रवासियों ने पेयजल संकट की उच्चस्तरीय जांच कराने, जल गुणवत्ता परीक्षण करवाने तथा एसईसीएल और संबंधित विभागों की संयुक्त निगरानी में स्थायी समाधान सुनिश्चित करने की मांग की है। उनका कहना है कि खनन प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि उन्हें मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष न करना पड़े।
संवाददाता/सौरभ साहू ,भटगांव जिला सूरजपुर छत्तीसगढ़।
सूरजपुर/भटगांव। प्रदेश में काले हीरे की नगरी के नाम से पहचान रखने वाला भटगांव क्षेत्र एक ओर देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, वहीं दूसरी ओर यहां के लोग मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। एसईसीएल भटगांव क्षेत्र की खदानों से हर महीने करोड़ों-अरबों रुपये मूल्य का कोयला उत्पादन किया जाता है, लेकिन खनन प्रभावित क्षेत्रों के नागरिक आज भी स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित हैं। नगर पंचायत भटगांव के वार्ड क्रमांक 8 और 10 में पेयजल संकट गंभीर रूप लेता जा रहा है। स्थानीय रहवासियों का आरोप है कि सुबह जलापूर्ति शुरू होने के बाद कई घंटों तक नलों से कोयला मिश्रित काला पानी निकलता है। लोगों का कहना है कि यह पानी न पीने योग्य होता है और न ही घरेलू उपयोग के लिए उपयुक्त। इसके कारण दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा है तथा लोगों में स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी बढ़ रही हैं।स्थानीय नागरिकों के अनुसार यह समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि लंबे समय से बनी हुई है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि जिस इलाके में वर्षों से कोयला खनन किया जा रहा है, वहां जल स्रोतों और पेयजल व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए था, लेकिन स्थिति इसके विपरीत दिखाई दे रही है।जानकारी के अनुसार क्षेत्र में जल शोधन (फिल्टर) की व्यवस्था मौजूद है, फिर भी वार्ड 8 और 10 के लोगों को स्वच्छ पानी नहीं मिल पा रहा है। स्थानीय लोगों का दावा है कि खदान क्षेत्र से आने वाला पानी पहले प्रभावित वार्डों तक पहुंचता है और उसके बाद शोधन प्रक्रिया से गुजरता है। इसके चलते जल गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
भटगांव क्षेत्र के लोगों का कहना है कि एसईसीएल की खदानों से वर्षों से बड़े पैमाने पर कोयला उत्पादन हो रहा है। कई ग्रामीण अपनी जमीनें खनन परियोजनाओं के लिए दे चुके हैं, लेकिन आज भी अनेक प्रभावित परिवार रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में पेयजल संकट ने लोगों की परेशानियों को और बढ़ा दिया है।
क्षेत्रवासियों ने जलापूर्ति व्यवस्था की निगरानी और रखरखाव पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि नियमित निरीक्षण, सफाई और गुणवत्ता परीक्षण के अभाव में समस्याएं लगातार बनी हुई हैं। लोगों का आरोप है कि जिम्मेदार एजेंसियों द्वारा प्रभावी निगरानी नहीं किए जाने के कारण स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो पा रहा है।स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब भटगांव की खदानें देश को ऊर्जा देने और अरबों रुपये का राजस्व उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं, तब खनन प्रभावित क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा सुनिश्चित करना भी एसईसीएल और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है। इसके बावजूद वार्ड 8 और 10 के लोग आज भी काला पानी मिलने की समस्या से जूझ रहे हैं।
क्षेत्रवासियों ने पेयजल संकट की उच्चस्तरीय जांच कराने, जल गुणवत्ता परीक्षण करवाने तथा एसईसीएल और संबंधित विभागों की संयुक्त निगरानी में स्थायी समाधान सुनिश्चित करने की मांग की है। उनका कहना है कि खनन प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि उन्हें मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष न करना पड़े।



Journalist खबरीलाल













