Shreekant Jaiswal, Koriya
कोरिया /बात जब एक कैडर ग्रेट अधिकारी के अधिकारों की हो या फिर उनके कार्य प्रणाली की हो तो कहीं ना कहीं पर ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ के वन महकमे में बैठे दागियों की इस सरकार में जोरदार जलवा कायम है।इस राज्य में योग्यता पर नहीं बल्कि रिश्तेदारी से मिलती नजर आती हैं बड़ी बड़ी कुर्सियां फिर वो चाहे दागी अफसरों की फौज हो या फिर भ्रष्टाचार में मैडल पा चुके रशूखदार तपका बस मुखिया जी की चापलूसी जानता हो समझो मिल गई कुर्सी।जी हां आप सही समझ रहे हैं बात वन विभाग की ही हो रही है।और जहां के हालात काफी लचर और लाचारी भरे हो चुके हैं।आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ राज्य के पूर्व की सरकार में वन विभाग के डी एफ ओ रैंक के अधिकारियों के पास उनके खुद के काफी अधिकार हुआ करते थे।अधिकारी अपने कार्य क्षेत्र अंतर्गत फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हुआ करते थे। इन अधिकारियों की अपनी कार्यशैली हुआ करती थी। हमेशा इनकी योग्यता का जौहर समूचे वन महकमे में कुशलता का परिचायक रही है लेकिन न जाने आखिर क्यू राज्य की भूपेश सरकार को ऐसी शैली पसंद नहीं आई और एक लंबा चौड़ा वृहद स्तर का अनुशासित सक्रिय अमला सिंगल विंडो मतलब एकाधिकार में झोंक दिया गया।जंगल की जमीनी जिम्मेदारी जो हमेशा से स्थानीय स्तर के लोगों के अधीन हुआ करती थी जिसे बांधकर रख दिया गया है।जिसका सीधा और बड़ा दुष्परिणाम यही देखने को मिल रहा है कि डिप्टी रेंजर जैसे लोग अपने मूल दायित्वों को दरकिनार कर निर्माण कार्य और विभागीय आय ब्यय के उलट फेर में ही लगे हुए हैं।हाल ही में कई ऐसे वन मंडलों में ऐसी गतिविधियां सुनी और बताई गई हैं कि डिप्टी रेंजर जैसे लोगों की जुबानी यही सुना जा रहा है कि डी एफ ओ और सी सी एफ हमारा क्या कर लेंगे जब तक राकेश चतुर्वेदी जी हमारे साथ हैं।
क्या मनेंद्रगढ़ रेंज के लिए हीरालाल सेन से ज्यादा काबिल रेंजर कोई नहीं,,राकेश चतुर्वेदी के लिए ??
12 वर्षों से ज्यादा का समय एक ही जिले में बिताने और बड़ी बड़ी विभागीय लापरवाही और गंभीर आरोप के बावजूद मनेंद्रगढ़ के डिप्टी रेंजर व प्रभारी रेंजर हीरालाल सेन के साथ कब तक और कौन सी रिश्तेदारी निभाएंगे पी सी सी एफ चतुर्वेदी जी।मनेंद्रगढ़ जैसी स्थिति और भी कई वन मंडलों में व्याप्त है जिससे यही प्रतीत और ताज्जुब होता है कि राज्य स्तर पर बैठे बड़े अधिकारी की कार्यशैली कितनी बेतुकी और गैरजिम्मेदाराना है। जो ये कहते हैं कि मेरे पास निचले स्तर को देखने का वक़्त नहीं है और फिर उन्ही की गंभीर शिकायतों को नजर अंदाज कर संरक्षण देते हैं।मतलब करनी और कथनी दोनों में बड़ा फर्क स्पष्ट होता है।विडंबना है अगर ऐसे अधिकारी जिनकी भूमिका अपने आप में अडिग न हो उनसे इतनी बड़ी जिम्मेदारी का परिपालन कितना सुचारू होगा कयास लगाए जा सकते हैं।
दायरों में सिमट चुका है राज्य स्तर का वन प्रशासनिक अमला ,,,
एकाधिकार कीऔर सांठ गांठ की सेटिंग बीट गार्ड से लेकर डी एफ ओ सहित वन संरक्षक व मुख्य वन संरक्षक तक के तबादले, पदस्थापना, फिर गोपाल गांठ का खेल और फिर चरण वंदन और चढ़ावा तब मिलती है कुर्सी,प्रतीत होता है कि वर्तमान परिदृश्य यही है की भूपेश सरकार की बनी बनाई छवि और सुशासन को सीधी तौर पर कुशासन की ओर धकेलने का एक भी प्रयास खाली नहीं छोड़ा जा रहा है।ये सभी बातें भले ही सार्वजनिक तौर पर किसी भी अधिकारी कर्मचारी के द्वारा ना कही जाती हो लेकिन दबी जुबान राकेश चतुर्वेदी बीट गार्ड से लेकर डी एफ ओ और सी सी एफ जैसे अधिकारियों के जुबानी हर जगह चर्चित पाए जाते
Shreekant Jaiswal, Koriya
कोरिया /बात जब एक कैडर ग्रेट अधिकारी के अधिकारों की हो या फिर उनके कार्य प्रणाली की हो तो कहीं ना कहीं पर ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ के वन महकमे में बैठे दागियों की इस सरकार में जोरदार जलवा कायम है।इस राज्य में योग्यता पर नहीं बल्कि रिश्तेदारी से मिलती नजर आती हैं बड़ी बड़ी कुर्सियां फिर वो चाहे दागी अफसरों की फौज हो या फिर भ्रष्टाचार में मैडल पा चुके रशूखदार तपका बस मुखिया जी की चापलूसी जानता हो समझो मिल गई कुर्सी।जी हां आप सही समझ रहे हैं बात वन विभाग की ही हो रही है।और जहां के हालात काफी लचर और लाचारी भरे हो चुके हैं।आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ राज्य के पूर्व की सरकार में वन विभाग के डी एफ ओ रैंक के अधिकारियों के पास उनके खुद के काफी अधिकार हुआ करते थे।अधिकारी अपने कार्य क्षेत्र अंतर्गत फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हुआ करते थे। इन अधिकारियों की अपनी कार्यशैली हुआ करती थी। हमेशा इनकी योग्यता का जौहर समूचे वन महकमे में कुशलता का परिचायक रही है लेकिन न जाने आखिर क्यू राज्य की भूपेश सरकार को ऐसी शैली पसंद नहीं आई और एक लंबा चौड़ा वृहद स्तर का अनुशासित सक्रिय अमला सिंगल विंडो मतलब एकाधिकार में झोंक दिया गया।जंगल की जमीनी जिम्मेदारी जो हमेशा से स्थानीय स्तर के लोगों के अधीन हुआ करती थी जिसे बांधकर रख दिया गया है।जिसका सीधा और बड़ा दुष्परिणाम यही देखने को मिल रहा है कि डिप्टी रेंजर जैसे लोग अपने मूल दायित्वों को दरकिनार कर निर्माण कार्य और विभागीय आय ब्यय के उलट फेर में ही लगे हुए हैं।हाल ही में कई ऐसे वन मंडलों में ऐसी गतिविधियां सुनी और बताई गई हैं कि डिप्टी रेंजर जैसे लोगों की जुबानी यही सुना जा रहा है कि डी एफ ओ और सी सी एफ हमारा क्या कर लेंगे जब तक राकेश चतुर्वेदी जी हमारे साथ हैं।
क्या मनेंद्रगढ़ रेंज के लिए हीरालाल सेन से ज्यादा काबिल रेंजर कोई नहीं,,राकेश चतुर्वेदी के लिए ??
12 वर्षों से ज्यादा का समय एक ही जिले में बिताने और बड़ी बड़ी विभागीय लापरवाही और गंभीर आरोप के बावजूद मनेंद्रगढ़ के डिप्टी रेंजर व प्रभारी रेंजर हीरालाल सेन के साथ कब तक और कौन सी रिश्तेदारी निभाएंगे पी सी सी एफ चतुर्वेदी जी।मनेंद्रगढ़ जैसी स्थिति और भी कई वन मंडलों में व्याप्त है जिससे यही प्रतीत और ताज्जुब होता है कि राज्य स्तर पर बैठे बड़े अधिकारी की कार्यशैली कितनी बेतुकी और गैरजिम्मेदाराना है। जो ये कहते हैं कि मेरे पास निचले स्तर को देखने का वक़्त नहीं है और फिर उन्ही की गंभीर शिकायतों को नजर अंदाज कर संरक्षण देते हैं।मतलब करनी और कथनी दोनों में बड़ा फर्क स्पष्ट होता है।विडंबना है अगर ऐसे अधिकारी जिनकी भूमिका अपने आप में अडिग न हो उनसे इतनी बड़ी जिम्मेदारी का परिपालन कितना सुचारू होगा कयास लगाए जा सकते हैं।
दायरों में सिमट चुका है राज्य स्तर का वन प्रशासनिक अमला ,,,
एकाधिकार कीऔर सांठ गांठ की सेटिंग बीट गार्ड से लेकर डी एफ ओ सहित वन संरक्षक व मुख्य वन संरक्षक तक के तबादले, पदस्थापना, फिर गोपाल गांठ का खेल और फिर चरण वंदन और चढ़ावा तब मिलती है कुर्सी,प्रतीत होता है कि वर्तमान परिदृश्य यही है की भूपेश सरकार की बनी बनाई छवि और सुशासन को सीधी तौर पर कुशासन की ओर धकेलने का एक भी प्रयास खाली नहीं छोड़ा जा रहा है।ये सभी बातें भले ही सार्वजनिक तौर पर किसी भी अधिकारी कर्मचारी के द्वारा ना कही जाती हो लेकिन दबी जुबान राकेश चतुर्वेदी बीट गार्ड से लेकर डी एफ ओ और सी सी एफ जैसे अधिकारियों के जुबानी हर जगह चर्चित पाए जाते



Journalist खबरीलाल














