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विशेष टिप्पणी :: शराब के क्वार्टर, हाफ की उपलब्धता क्यों नहीं ?:

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जबसे पूर्व भाजपा सरकार द्वारा शराब को ठेका पद्धति से निकालकर खुद शराब दुकानों का संचालन केवल अति राजस्व लाभ हेतु सरकार ने अपने खुद के संचालन में लिया है तब से नामी ब्रांड की जगह ऐसे ऐसे ब्रांड दिखने लगे जिसका नाम लोग पहली बार सुन रहे होते हैं और वही ब्रांड बेचे भी जा रहे हैं। 

छःग राज्य मार्केटिंग कारपोरेशन लिमिटेड द्वारा ही समूचे छःग प्रदेश में शराब दुकान संचालन हेतु "प्लेसमेंट कंपनीयों" को नियुक्त किया गया जो छःग के बेरोजगार युवाओं को भर्ती कर टेंडर अनुसार मिले दुकानों का संचालन करवा सके। CSMCL के कर्ताओं ने बहुत मेहनत कर सिस्टम तैयार किया है प्रोक्योरमेंट से शुरू कर सप्लाई चैन, रेट फिक्सेशन आदि किये हैं उसके लिए विभाग को साधुवाद। लेकिन जिन ब्रांडों के शराब खरीदे जा रहे हैं वो नाम शायद ही छत्तीसगढ़ वासियों ने कभी सुना हो जैसे - लिरोई, रफल, रॉयल प्राइड, रॉयल पैशन, डिस्कवरी, आफ्टर डार्क व आदि। 

प्रीमियम शॉप खोलने से पहले शराब दुकानों में केवल फूल बोतल ही बेचा जाता था। उस समय क्वार्टर, हाफ न के बराबर मिलते थे और वो आज भी कायम है। प्रीमियम शॉप खुलने के बाद वहां सिर्फ फूल बोतल ही बेचे जा रहे हैं, ऐसा क्यों और किसलिए ? क्यों नहीं अच्छे ब्रांड के क्वार्टर, हाफ भी प्रीमियम शॉप के साथ अन्य दुकानों में भी उपलब्ध हो। ऐसा CSMCL क्यों नहीं करती है ? क्या CSMCL मदिरा प्रेमियों को फूल बोतल खरीदने हेतु  एक तरह से हिडन प्रेशर क्रिएट तो नहीं कर रही है ?

जो व्यक्ति निप/क्वार्टर खरीदने जा रहा है उन्हें उनके पसंदीदा ब्रांड नहीं मिलता है, फलस्वरूप व्यक्ति को फूल बोतल खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है। यानी अपने बजट से ज्यादा जेब से पैसे निकल रहे हैं और राजस्व को देखकर अधिकारी खुश हो रहे हैं। इसके साथ ही "OVER RATE" का खेल भी अलग है जिससे कमाई एक्स्ट्रा होता है। सुबह 9 बजे से रात 10 बजे तक शराब दुकान संचालित होता है तो लोग ये सोच ही सकते हैं की दिनभर में कितना OVER RATE से कमाई हुई होगी। 

अब जो सवाल उठ रहा है वो बहुत बड़ा है। वो सवाल ये है कि ये एक्स्ट्रा काली कमाई किनके जेब मे जा रहा है ? अकेले प्लेसमेंट कंपनी ये कार्य कर सकती है क्या ? यदि नहीं कर सकती तो ये प्लेसमेंट कंपनी किनके छत्र छाया में ये कार्य कर रही है ? सूत्रों से मिली जानकारी और रिपोर्ट के अनुसार ये खेल शहर के आउटर और ग्रामीण-कस्बे इलाके में धड़ल्ले से हो रहे हैं और प्लेसमेंट कंपनी मालामाल हो रहे हैं।


जबसे पूर्व भाजपा सरकार द्वारा शराब को ठेका पद्धति से निकालकर खुद शराब दुकानों का संचालन केवल अति राजस्व लाभ हेतु सरकार ने अपने खुद के संचालन में लिया है तब से नामी ब्रांड की जगह ऐसे ऐसे ब्रांड दिखने लगे जिसका नाम लोग पहली बार सुन रहे होते हैं और वही ब्रांड बेचे भी जा रहे हैं। 

छःग राज्य मार्केटिंग कारपोरेशन लिमिटेड द्वारा ही समूचे छःग प्रदेश में शराब दुकान संचालन हेतु "प्लेसमेंट कंपनीयों" को नियुक्त किया गया जो छःग के बेरोजगार युवाओं को भर्ती कर टेंडर अनुसार मिले दुकानों का संचालन करवा सके। CSMCL के कर्ताओं ने बहुत मेहनत कर सिस्टम तैयार किया है प्रोक्योरमेंट से शुरू कर सप्लाई चैन, रेट फिक्सेशन आदि किये हैं उसके लिए विभाग को साधुवाद। लेकिन जिन ब्रांडों के शराब खरीदे जा रहे हैं वो नाम शायद ही छत्तीसगढ़ वासियों ने कभी सुना हो जैसे - लिरोई, रफल, रॉयल प्राइड, रॉयल पैशन, डिस्कवरी, आफ्टर डार्क व आदि। 

प्रीमियम शॉप खोलने से पहले शराब दुकानों में केवल फूल बोतल ही बेचा जाता था। उस समय क्वार्टर, हाफ न के बराबर मिलते थे और वो आज भी कायम है। प्रीमियम शॉप खुलने के बाद वहां सिर्फ फूल बोतल ही बेचे जा रहे हैं, ऐसा क्यों और किसलिए ? क्यों नहीं अच्छे ब्रांड के क्वार्टर, हाफ भी प्रीमियम शॉप के साथ अन्य दुकानों में भी उपलब्ध हो। ऐसा CSMCL क्यों नहीं करती है ? क्या CSMCL मदिरा प्रेमियों को फूल बोतल खरीदने हेतु  एक तरह से हिडन प्रेशर क्रिएट तो नहीं कर रही है ?

जो व्यक्ति निप/क्वार्टर खरीदने जा रहा है उन्हें उनके पसंदीदा ब्रांड नहीं मिलता है, फलस्वरूप व्यक्ति को फूल बोतल खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है। यानी अपने बजट से ज्यादा जेब से पैसे निकल रहे हैं और राजस्व को देखकर अधिकारी खुश हो रहे हैं। इसके साथ ही "OVER RATE" का खेल भी अलग है जिससे कमाई एक्स्ट्रा होता है। सुबह 9 बजे से रात 10 बजे तक शराब दुकान संचालित होता है तो लोग ये सोच ही सकते हैं की दिनभर में कितना OVER RATE से कमाई हुई होगी। 

अब जो सवाल उठ रहा है वो बहुत बड़ा है। वो सवाल ये है कि ये एक्स्ट्रा काली कमाई किनके जेब मे जा रहा है ? अकेले प्लेसमेंट कंपनी ये कार्य कर सकती है क्या ? यदि नहीं कर सकती तो ये प्लेसमेंट कंपनी किनके छत्र छाया में ये कार्य कर रही है ? सूत्रों से मिली जानकारी और रिपोर्ट के अनुसार ये खेल शहर के आउटर और ग्रामीण-कस्बे इलाके में धड़ल्ले से हो रहे हैं और प्लेसमेंट कंपनी मालामाल हो रहे हैं।


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